खुद को जागरूक कैसे करें

खुद को जागरूक बनाना मतलब अपनी इच्छाओं और ज़रूरतों में फर्क समझना। 

उदाहरण के लिए, मान लो आपको भूख लगी है और टेबल पर दो तरह का खाना रखा है—एक तरफ साधारण दाल या सलाद है, और दूसरी तरफ मछली या कोई मीट।

भूख मिटाने के लिए दोनों ही चीज़ें पर्याप्त हैं। आपके शरीर को सिर्फ भोजन चाहिए—चाहे वह दाल हो या मीट। लेकिन आपका मन स्वाद ढूंढता है और उसी स्वाद के आधार पर चुनाव करता है।

जागरूकता का पहला कदम यह है कि आप स्वाद की इच्छा को थोड़ी देर के लिए शांत करें और सिर्फ अपनी वास्तविक भूख को पहचानें। जब आप मन की चाहत से ऊपर उठकर ऐसा भोजन चुनते हैं जो प्रकृति और संतुलन के सिद्धांतों के अनुकूल हो, तो यह जागरूकता की ओर आपका पहला कदम हो सकता है।

जागरूकता का मतलब है— अपने मन की आदतों को देखना, उनके पीछे के कारणों को समझना, और फिर शरीर की असली ज़रूरत के अनुसार निर्णय लेना।

खुद को जागरूक कैसे करें

डिजिटल दुनिया में जागरूकता

सोचिए, आप सुबह सोकर उठते हैं या दिन के किसी खाली समय में बैठते हैं। आपके सामने दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता है किसी ज्ञानवर्धक किताब को पढ़ना, प्रकृति को निहारना या शांत बैठकर अपने विचारों को देखना। दूसरा रास्ता है अपना स्मार्टफोन उठाना और सोशल मीडिया की रील्स या शॉर्ट्स को स्क्रॉल करना शुरू कर देना।

इनमें से कोई भी चीज़ आपके खाली समय को भर सकती है? 

आपके मस्तिष्क को आराम, शांति और कुछ नया सीखने की ज़रूरत होती है, चाहे वह किताब से मिले या मौन से; लेकिन आपका मन मनोरंजन का स्वाद ढूंढता है। उसे हर सेकंड एक नया वीडियो, एक नया लाइक या एक नया नोटिफिकेशन चाहिए।

अगर आप इस डिजिटल स्वाद (Temporary Pleasure) को कुछ देर के लिए भूलकर अपनी आत्मा की वास्तविक ज़रूरत पर ध्यान दें और वह रास्ता चुनें जो आपके मानसिक स्वास्थ्य और प्रकृति के अनुकूल हो, तो यह डिजिटल दुनिया में जागरूकता की ओर आपका एक और बड़ा कदम हो सकता है। जब आप स्क्रीन से आँखें हटाकर सामने लगे फूल और पौधे को देखते हैं, तो आप मन के जाल को तोड़कर सीधे ब्रह्मांड की बनाई असली सुंदरता से जुड़ जाते हैं।

बातचीत में जागरूकता

मान लीजिए आपके किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से आपकी बहस हो रही है। उसने गुस्से में आकर आपको कुछ कड़वा कह दिया। अब आपके पास अंदर ही अंदर दो विकल्प तैयार खड़े हैं। पहला विकल्प है शांत हो जाना, गहरी सांस लेना और सामने वाले की स्थिति को समझने की कोशिश करना, जो कि साधारण दाल या सलाद की तरह बिल्कुल सादा और शांत है। दूसरा विकल्प है तुरंत पलटकर उससे भी ज़्यादा कड़वा जवाब देना, जो उस समय मसालेदार मीट की तरह आपके अहंकार (Ego) को बहुत स्वादिष्ट लगेगा।

इन दोनों में से कोई भी रास्ता उस बहस को खत्म कर सकता है? 

आपके रिश्ते को उस वक्त सिर्फ शांति और समझदारी की ज़रूरत होती है, चाहे वह मौन से आए या ठंडे दिमाग से; लेकिन आपका मन तुरंत बदला लेने और खुद को सही साबित करने का स्वाद ढूंढता है।

अगर आप उस कड़वे जवाब के तात्कालिक स्वाद को भूलकर सिर्फ रिश्ते की भलाई पर ध्यान दें और मौन या क्षमा को चुनें जो कि प्रकृति के संतुलन के अनुकूल है, तो यह आपकी मानसिक जागरूकता का एक अद्भुत उदाहरण होगा। प्रतिक्रिया देने से पहले का वह एक सेकंड का ठहराव ही आपको मन का गुलाम बनने से बचाता है।