होश में कैसे जिएं

हर सुबह जब आप अपने दफ्तर (Office) जाने के लिए या बस पार्क में टहलने के लिए घर से बाहर निकलते हैं, तो आपका मन  पहले से ही तरह-तरह के फालतू विचारों और चिंताओं से भरा होता है। वह तुरंत आपके पूरे दिन की काल्पनिक योजनाएँ बनाना शुरू कर देता है। आप रास्ते भर यही सोचते रहते हैं कि आज काम पर अपने मैनेजर या साथियों को क्या जवाब देंगे, या जब वे आपसे कोई कठिन सवाल पूछेंगे तो आप खुद को कैसे सही साबित करेंगे।

आप अपने ही दिमाग की प्रयोगशाला में दिनभर के लिए कई सवाल और उनके जवाब खुद ही तैयार कर लेते हैं। लेकिन होता क्या है? दिन के आखिर में, असलियत में आपसे कोई भी वे सवाल नहीं पूछता और पूरा दिन बहुत ही आसानी और शांति से गुज़र जाता है। ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए—आपने बिना किसी ठोस वजह के, सिर्फ अपने मन के खेल में उलझकर, अपनी सुबह की अनमोल मानसिक ऊर्जा और कीमती समय पूरी तरह बर्बाद कर दिया।

क्या अपने ही विचारों के इस जाल में खोए रहने को होश में जीना कहते हैं? बिल्कुल नहीं!

तो फिर होश में जीने का असली मतलब क्या है और हमें क्या करना चाहिए?

होश में कैसे जिएं

जब भी आप सुबह बाहर टहलने या काम पर जाएं, तो अपने दिमाग के इन काल्पनिक विचारों के चक्रव्यूह से बाहर निकलें। रास्ते में आने वाले हरे-भरे पेड़ों और खूबसूरत फूलों को देखे । सुबह की उस ठंडी हवा की ताज़गी और पत्तियों पर चमकती ओस की बूंदों को अपनी त्वचा पर महसूस करें।

किसी भी पेड़ को ठहरकर देखिए और खोजने की कोशिश कीजिए कि प्रकृति ने उस एक छोटे से पेड़ में कितनी अद्भुत और बारीक चीज़ें बनाई हैं। उसकी नई, कोमल पत्तियों, उनके बदलते रंगों और शाखाओं के अनूठे फैलाव को अपनी आँखों से निहारें। सिर उठाकर देखिए कि नीले आसमान के विशाल कैनवास पर उस पेड़ का ऊपरी हिस्सा कितना भव्य और जादुई दिखाई देता है।

सरल शब्दों में कहें तो—जीवन में ‘सोचने’ के बजाय ‘देखने और महसूस करने’ पर ज़्यादा ध्यान दें। जब आप रास्ते में हों, तो सिर्फ रास्ते की सुंदरता का आनंद लें। और हाँ, जब आप ऑफ़िस की मेज पर बैठें, तब पूरी एकाग्रता से केवल अपने काम के बारे में सोचें और सचेत होकर निर्णय लें। जो पल जहाँ है, उसे वहीं जीना—यही वास्तव में होशपूर्वक जीने का असली विज्ञान है।

सचेत होकर (होश में) कैसे चलें? आइए इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझते हैं।

मान लीजिए, आप सड़क के किनारे अपने पालतू कुत्ते के साथ टहल रहे हैं। आप चल रहे हैं और कुत्ता आपसे एक मीटर की दूरी पर आगे बढ़ रहा है; आपके और कुत्ते के बीच एक रस्सी (Leash) है। तभी सामने से कोई राहगीर आता है और आपके पास से गुज़रना चाहता है। लेकिन स्थिति यह है कि आप और आपका कुत्ता मिलकर रास्ते की पूरी चौड़ाई घेरे हुए हैं।

ऐसे में वह व्यक्ति आपके पास से कैसे गुज़रे? एक तरफ कुत्ता उसे डरा रहा है और दूसरी तरफ सड़क पर गाड़ियाँ चल रही हैं। अगर आप सचमुच जागरूक हैं, तो आप उस अजनबी व्यक्ति की आज़ादी और उसकी परेशानी को तुरंत समझ जाएंगे—बिना उसके रंग, जाति, लिंग या नस्ल पर ध्यान दिए। उस पल आपका कर्तव्य है कि आप कुत्ते की रस्सी को छोटा करें और उसे सम्मानपूर्वक निकलने का रास्ता दें। यही वास्तव में ‘होश में चलना’ है।

होश में जीने या चलने का सीधा सा मतलब यही है कि आप अपने अस्तित्व के साथ-साथ, इस दुनिया में दूसरों की आज़ादी, उनकी सीमाओं और उनके हकों (अधिकारों) का भी पूरा ध्यान रखें।

एक और उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए, सुबह आप बस से ऑफ़िस जा रहे हैं और हर कोई अपनी-अपनी जल्दी में है। आप बस में तो चढ़ गए, लेकिन आपको बैठने के लिए सीट नहीं मिली। अब आप एक बड़ा सा बैगपैक (पीठ पर टांगने वाला बैग) टांगे बस के बीचों-बीच खड़े हैं। ऐसा करके खड़े होने से पहले ज़रा सोचिए—क्या आपके उस बड़े बैग की वजह से दूसरे यात्रियों को अपने स्टॉप पर उतरने या बस में आगे बढ़ने में परेशानी तो नहीं हो रही है?

हर बार दूसरे यात्रियों का यह कहना ज़रूरी नहीं है कि “एक्सक्यूज़ मी, मुझे आगे बढ़ने का रास्ता दीजिए।”

आपको खुद उनकी आज़ादी और सुविधा को समझना होगा। सिर्फ़ आप ही जल्दी में नहीं हैं, बल्कि पूरी बस में मौजूद हर इंसान किसी न किसी काम से निकला है। अगर बस भरी हुई है, तो आपको अपनी समस्या (जैसे भारी बैग) का समाधान खुद संभालकर करना होगा, दूसरों को असुविधा पहुँचाकर नहीं। यही होशपूर्वक यात्रा करना है

आइए एक तीसरा उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए, एक व्यक्ति अपनी कार के पास खड़ा है या कार के भीतर बैठा है और उसने अपनी गाड़ी का म्यूज़िक सिस्टम पूरी आवाज़ में चालू कर रखा है। वह तेज़ बेस (Bass) और गानों की आवाज़ का आनंद ले रहा है।

लेकिन ऐसा करने से पहले ज़रा ठहरकर सोचने की ज़रूरत है। क्या वह तेज़ संगीत किसी बीमार बुज़ुर्ग, परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र या किसी थके हुए इंसान की शांति में खलल तो नहीं डाल रहा है?

उन आस-पास के लोगों का आपके पास आकर यह कहना ज़रूरी नहीं है कि “कृपया आवाज़ कम कीजिए, हमें परेशानी हो रही है।”

आपको खुद उनकी मानसिक शांति और उनके सुकून की आज़ादी को समझना होगा। 

आपका मन (पार्ट A) शायद उस तेज़ म्यूज़िक के स्वाद या मजे में डूबा हो सकता है, लेकिन आपकी जागरूकता (सुपर पार्ट B) को यह सोचना होगा कि आपका मनोरंजन किसी दूसरे के लिए सरदर्द न बने। अपनी खुशियों का जश्न इस तरह मनाना कि दूसरों के हक और सुकून को नुकसान न पहुँचे, यही समाज में होशपूर्वक जीना है।