मिट्टी की कीमत

श्रेणी : बदलाव का अहसास

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मिट्टी की कीमत-बदलाव का अहसास

मैंने खेत नहीं बेचे थे… मैंने अपने सबसे खूबसूरत दिन बेच दिए – मनवीर का पछतावा

शाम ढल रही थी। पक्षी झुंड बनाकर अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। शायद वे भी पूरे दिन की थकान के बाद अपने घर पहुँचने की जल्दी में थे।

करीब तीस साल की मनवीर अपनी छत पर खड़ी दूर-दूर तक फैले खेतों को देख रही थी। हवा में मिट्टी की हल्की-सी खुशबू घुली हुई थी। कहीं दूर ट्यूबवेल के चलने की धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी। सामने लहलहाती फसलें थीं, लेकिन वे खेत अब उसके नहीं थे।

उसे उन खेतों से ज़्यादा… उन दिनों की याद आ रही थी, जो उन्हीं खेतों के साथ कहीं पीछे छूट गए थे।

कुछ साल पहले तक यही खेत उसके परिवार के थे।

मनवीर की शादी करम से हुई थी। करम मेहनती किसान था। सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में पहुँच जाता और शाम को घर लौटता। उसके चेहरे पर थकान होती थी, लेकिन मन में संतोष भी होता था।

वह अक्सर मुस्कुराकर कहता,

“चलो मनवीर, आज मेरे साथ खेत चलते हैं। काम भी हो जाएगा और बातें भी।”

लेकिन मनवीर हर बार मना कर देती।

कभी कहती, “धूप बहुत है।”

कभी कहती, “मुझे मिट्टी में काम करना अच्छा नहीं लगता।”

और कभी हँसकर कहती,

“क्या पूरी ज़िंदगी यही करते रहेंगे?”

उसके मन में एक ही सपना था—विदेश जाकर बेहतर जीवन जीना।

वह करम से बार-बार कहती,

“ज़मीन बेच देते हैं। परदेस में कमाई भी ज़्यादा होगी और ज़िंदगी भी आसान होगी।”

करम हर बार चुप हो जाता।

उसे खेतों से बहुत लगाव था। वे सिर्फ़ ज़मीन नहीं थे, उसके पिता और दादा की मेहनत की निशानी थे।

लेकिन उसे मनवीर से भी उतना ही प्यार था।

आख़िर एक दिन उसने मनवीर की इच्छा पूरी कर दी।

खेत बिक गए।

कुछ महीनों बाद करम दूसरे देश चला गया।

शुरुआत में सब कुछ ठीक लगा।

करम वहाँ दिन-रात मेहनत करता रहा।

वह हर महीने पैसे भेजता रहा।

घर की मरम्मत हो गई।

नई गाड़ी भी आ गई।

बैंक में बचत भी बढ़ने लगी।

लेकिन धीरे-धीरे मनवीर को महसूस होने लगा कि घर में सब कुछ है…

बस घर वाला इंसान नहीं है।

दिन किसी तरह निकल जाता था।

लेकिन रात…

रात बहुत लंबी हो जाती थी।

खाना खाते समय सामने वाली कुर्सी खाली रहती।

कोई यह पूछने वाला नहीं था कि दिन कैसा बीता।

किसी से छोटी-छोटी बातें करने वाला भी कोई नहीं था।

एक शाम वह फिर छत पर खड़ी थी।

उसकी नज़र उन खेतों पर पड़ी, जो कभी उसके अपने थे।

अब वहाँ एक किसान अपनी पत्नी के साथ काम कर रहा था।

दोनों मिलकर फसल काट रहे थे।

बीच-बीच में हँसते, बातें करते और फिर काम में लग जाते।

मनवीर उन्हें देर तक देखती रही।

अचानक उसकी आँखों के सामने पुरानी यादें घूमने लगीं।

करम भी तो उसे कितनी बार अपने साथ खेत चलने के लिए कहता था।

वह उसे मज़दूरी कराने के लिए नहीं बुलाता था।

वह चाहता था कि दोनों साथ रहें।

साथ काम करें।

साथ थकें।

पेड़ की छाँव में बैठकर साथ रोटी खाएँ।

शाम को साथ घर लौटें।

मनवीर की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे पहली बार समझ आया कि खेतों की सबसे बड़ी फसल गेहूँ या धान नहीं थी…

सबसे बड़ी फसल तो वे पल थे, जिन्हें वह करम के साथ जी सकती थी।

उसने धीरे से खुद से कहा,

“मैंने खेत नहीं बेचे थे…

मैंने अपने सबसे खूबसूरत दिन बेच दिए थे।”

उस दिन उसे एक और बात समझ आई।

गलती विदेश जाने की नहीं थी।

गलती यह थी कि उसने यह मान लिया था कि पैसा ही अच्छी ज़िंदगी दे सकता है।

असल में अच्छी ज़िंदगी वहाँ होती है, जहाँ अपने लोग साथ हों।

अगर करम और वह मिलकर कोई भी फैसला करते—चाहे गाँव में रहते या विदेश जाते—शायद उसे आज इतना खालीपन महसूस नहीं होता।

हवा फिर से चली।

लेकिन इस बार उसमें मिट्टी की खुशबू के साथ एक गहरा अहसास भी था।

कुछ चीज़ों की कीमत पैसे से नहीं चुकाई जाती।

वे सिर्फ़ समय रहते समझी जाती हैं।

मनवीर देर तक उन खेतों को देखती रही।

अब वे खेत किसी और के थे।

और उसके पास…

सिर्फ़ यादें थीं।

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रीना कुछ देर तक चुप खड़ी रही। कमरे में जैसे हवा भी रुक गई थी। फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा,