देर से हुआ अहसास

श्रेणी : बदलाव का अहसास

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देर से हुआ अहसास

सुबह का समय था। स्कूल जाने वाले बच्चों की चहल-पहल पूरे मोहल्ले में फैली हुई थी। उषा अपनी लाल साइकिल और स्कूल बैग लेकर घर से बाहर निकली। गुलाबी सूट में वह हमेशा की तरह बहुत सुंदर लग रही थी। रोहित अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था। उसे देखते ही रोहित का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह उससे कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए। उषा बिना कुछ बोले उसके पास से गुज़र गई।

रोहित एक सीधा-सादा लड़का था। वह बारहवीं कक्षा में पढ़ता था। उसके घर के सामने उषा रहती थी।

हर सुबह जब उषा कॉलेज जाती, रोहित उसे एक नज़र देखने के लिए गेट पर खड़ा हो जाता। धीरे-धीरे उसे लगा कि यही प्यार है।

उसने अपने मन की बात कागज़ की छोटी-छोटी पर्चियों में लिखनी शुरू कर दी।

“तुम्हारी मुस्कान बहुत अच्छी है।”

“एक दिन तुमसे दोस्ती ज़रूर होगी।”

वह मौका देखकर पर्ची उषा तक पहुँचा देता।

लेकिन उषा को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसे लगा कि रोहित उसे परेशान कर रहा है।

एक दिन उसने सारी बात अपने घरवालों को बता दी।

बात रोहित के घर तक भी पहुँच गई।

उस दिन पहली बार उसके पिता ने उसे बहुत डाँटा।

माँ रोते हुए बोली, “बेटा, किसी को परेशान करके प्यार नहीं मिलता।”

रोहित का सिर झुक गया। उसी दिन उसने तय कर लिया कि अब वह कभी उषा के पीछे नहीं जाएगा।

अगले ही दिन से उसने रास्ता बदल लिया।

अगर सामने से उषा आती, तो वह दूसरी तरफ़ चल देता।

समय बीतता गया।

रोहित ने पढ़ाई पूरी की, नौकरी करने लगा और अपने काम में लग गया।

उधर उषा की ज़िंदगी अलग रास्ते पर चल पड़ी।

उसकी दोस्ती कई लड़कों से हुई। हर बार उसे लगा कि यही सच्चा प्यार है, लेकिन हर रिश्ता कुछ समय बाद टूट गया।

हर टूटे रिश्ते के साथ उसका भरोसा भी टूटता गया।

एक दिन पुराने सामान की सफाई करते समय उसे एक डिब्बा मिला।

उसमें रोहित की दी हुई वही पुरानी पर्चियाँ रखी थीं।

शायद गुस्से में भी वह उन्हें फेंक नहीं पाई थी।

उसने एक-एक पर्ची पढ़नी शुरू की।

हर पर्ची में सम्मान था।

हर पर्ची में सच्चाई थी।

कहीं कोई गंदी बात नहीं थी।

उषा की आँखों से आँसू बहने लगे।

उसे पहली बार समझ आया कि रोहित उसे पाना नहीं चाहता था, वह सच में उसे चाहता था।

उसे अपने फ़ैसले पर पछतावा होने लगा।

कई दिनों तक सोचने के बाद उषा ने रोहित को फ़ोन किया।

“अगर समय हो… तो आज शाम मेरे घर आ जाओ। मुझे तुमसे बहुत ज़रूरी बात करनी है।”

रोहित समझ गया कि उस समय उषा घर पर अकेली होगी।

उसकी आवाज़ काँप रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह वर्षों से अपने भीतर दबा हुआ बोझ उतार देना चाहती हो। शायद वह अपने दिल की सारी बातें कहना चाहती थी। शायद वह अब किसी भी सीमा की परवाह नहीं कर रही थी। उसे बस एक बार रोहित का सामना करना था।

रोहित कुछ देर तक चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।

उसके मन में पुरानी यादें ज़रूर आईं, लेकिन वे यादें अब बीते हुए समय का हिस्सा थीं।

वह अपनी ज़िंदगी में बहुत आगे निकल चुका था।

समय ने दोनों को बदल दिया था।

अब न हालात पहले जैसे थे, न रिश्ते बनने की कोई जगह बची थी।

उषा बोलती रही…

और रोहित बिना बीच में टोके सुनता रहा।

जब उसकी बात पूरी हो गई, तो फ़ोन के दूसरी तरफ़ कुछ पल की ख़ामोशी छा गई।

रोहित ने एक भी शब्द नहीं बोला।

उसने बस धीरे से फ़ोन रख दिया।

उस शाम वह उषा के घर नहीं गया।

और फिर कभी नहीं गया।

उषा देर तक दरवाज़े की ओर देखती रही।

उसने पहली बार समझा कि सच्चा प्यार किसी का शरीर नहीं चाहता, उसका सम्मान चाहता है।

जिस लड़के को उसने कभी समझा ही नहीं, वही लड़का आज उसके सबसे कठिन समय में भी उसकी मजबूरी का फ़ायदा उठाना नहीं चाहता था।

उस रात उषा बहुत रोई।

लेकिन कुछ आँसू ऐसे होते हैं जो किसी और को नहीं, सिर्फ़ अपने ही फ़ैसलों को याद करके निकलते हैं।

उसे देर से सही, लेकिन एक ऐसा अहसास हुआ जो पूरी ज़िंदगी उसके साथ रहने वाला था।

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