कल का इंतज़ार

श्रेणी : ज़िंदगी की सीख

शब्द : 987  l  पढ़ने का समय :  7 मिनट

कल का इंतज़ार

उसने काँपते हाथों से फोन चलाया। नेटवर्क बहुत धीमा था। स्क्रीन अचानक एक विज्ञापन पर अटक गई।

एक लड़की मुस्कुराते हुए कह रही थी—

“यह शैंपू इस्तेमाल करें और गोरी रंगत पाएँ!”

राहुल ने झुंझलाकर स्क्रीन पर दोबारा टैप किया।

“आज ही यह फॉर्म भरना था… और अब ये भी!”

राहुल पढ़ाई में बहुत होशियार था। कॉलेज में उसके शिक्षक अक्सर कहते थे—

“अगर राहुल अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत करे, तो वह बहुत आगे जा सकता है।”

राहुल मुस्कुरा देता।

उसे अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा था।

बस एक छोटी-सी समस्या थी।

वह हर काम के लिए एक ही शब्द इस्तेमाल करता था—

“कल।”

माँ कहतीं—

“राहुल, फीस जमा करने की आखिरी तारीख आज है।”

“कर दूँगा माँ… कल।”

दोस्त कहते—

“भाई, इंटरव्यू की तैयारी शुरू कर दे।”

“अभी बहुत समय है। कल से शुरू करता हूँ।”

पढ़ाई का असाइनमेंट हो, कोई जरूरी ईमेल हो या नौकरी के लिए आवेदन—राहुल हर काम को थोड़ी देर और टाल देता।

उसे लगता था कि कल उसके पास आज से ज्यादा समय होगा।

एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर एक खबर देखकर उसकी आँखें चमक उठीं।

देश की एक बड़ी कंपनी में नए स्नातकों के लिए नौकरी निकली थी।

वेतन अच्छा था।

काम उसके पसंद का था।

और सबसे बड़ी बात—कंपनी के शहर में ही उसके माता-पिता रहते थे।

राहुल ने तुरंत फॉर्म खोल लिया।

फॉर्म का लगभग पूरा हिस्सा भर भी दिया।

बस कुछ दस्तावेज़ अपलोड करने बाकी थे।

तभी उसका दोस्त अमित कमरे में आया।

“क्या कर रहा है?”

राहुल ने स्क्रीन दिखाते हुए कहा—

“बहुत अच्छी नौकरी निकली है। आज आखिरी तारीख है।”

अमित ने हैरानी से पूछा—

“तो भर क्यों नहीं रहा?”

राहुल हँस पड़ा।

“बस दो-तीन दस्तावेज़ अपलोड करने हैं। दस मिनट का काम है।”

“तो अभी कर।”

“अरे यार, अभी मन नहीं है। रात को कर दूँगा।”

अमित ने गंभीर होकर कहा—

“राहुल, आज आखिरी तारीख है।”

“पता है।”

“फिर?”

राहुल ने बेफिक्र होकर कहा—

“इतना बड़ा काम थोड़े ही है। रात को कर दूँगा।”

शाम को राहुल दोस्तों के साथ बाहर चला गया।

वापस आया तो थक चुका था।

माँ ने पूछा—

“बेटा, नौकरी वाला फॉर्म भर दिया?”

राहुल ने जूते उतारते हुए कहा—

“नहीं माँ। अभी रात बाकी है।”

माँ कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन चुप रह गईं।

राहुल ने खाना खाया।

फिर मोबाइल देखने लगा।

एक घंटे बाद उसने घड़ी देखी।

रात के साढ़े दस बज चुके थे।

“अब भर देता हूँ।”

उसने लैपटॉप खोला।

वेबसाइट खुल गई।

राहुल ने दस्तावेज़ ढूँढने शुरू किए।

तभी अचानक—

बत्ती चली गई।

कमरा अंधेरे में डूब गया।

राहुल कुछ सेकंड तक स्क्रीन की तरफ देखता रहा।

“कोई बात नहीं। बिजली अभी आ जाएगी।”

उसने मोबाइल की रोशनी में इंतज़ार किया।

दस मिनट।

बीस मिनट।

एक घंटा।

बिजली नहीं आई।

राहुल बेचैन हो गया।

उसने मोबाइल का इंटरनेट चलाकर फॉर्म खोलने की कोशिश की, लेकिन नेटवर्क भी बहुत कमजोर था।

रात के बारह बज गए।

फॉर्म की आखिरी तारीख समाप्त हो चुकी थी।

राहुल कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहा।

कुछ देर बाद बिजली वापस आ गई।

लैपटॉप की स्क्रीन चमकी।

राहुल ने तुरंत वेबसाइट खोली।

उसके सामने लिखा था—

“आवेदन की अंतिम तिथि समाप्त हो चुकी है।”

उसने एक बार फिर कोशिश की।

फिर दूसरी बार।

लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।

सुबह अमित का फोन आया।

“राहुल, फॉर्म भर दिया?”

कुछ पल तक राहुल चुप रहा।

फिर धीमी आवाज़ में बोला—

“नहीं।”

“क्यों?”

राहुल ने कहा—

“बिजली चली गई थी।”

फोन के दूसरी तरफ कुछ क्षण खामोशी रही।

फिर अमित बोला—

“बिजली तो रात में गई थी, राहुल। तुमने फॉर्म सुबह या दोपहर में भी भर सकते थे।”

राहुल के पास कोई जवाब नहीं था।

उस दिन पहली बार उसे अपनी आदत की असली कीमत समझ आई।

नौकरी उसने बिजली जाने की वजह से नहीं खोई थी।

उसने नौकरी इसलिए खोई थी क्योंकि उसने काम को समय रहते पूरा नहीं किया था।

अगर वह सुबह फॉर्म भर देता, तो बिजली की समस्या उसके रास्ते में नहीं आती।

अगर वह दोपहर में भर देता, तो भी नहीं आती।

अगर वह शाम को भर देता, तब भी नहीं।

समस्या सिर्फ दस मिनट की थी।

लेकिन उन दस मिनटों को वह बार-बार “कल” के हवाले करता रहा।

उस रात राहुल देर तक सो नहीं पाया।

उसने अपनी डायरी खोली और पहली बार अपनी आदत के बारे में लिखा—

“कल कभी आता नहीं। जब आता है, तो वह आज बन चुका होता है।”

अगली सुबह उसने अपने कमरे की दीवार पर एक कागज चिपकाया—

“जो काम आज हो सकता है, उसे आज ही पूरा करो।”

उस दिन से राहुल ने एक छोटा नियम बना लिया।

काम छोटा हो या बड़ा—

पहले जरूरी काम।

बाद में आराम।

जब भी उसके मन में आता—

“कल कर लूँगा…”

वह खुद से पूछता—

“अगर कल यह मौका मेरे पास न रहा तो?”

धीरे-धीरे उसकी आदत बदलने लगी।

असाइनमेंट समय पर जमा होने लगे।

नौकरी के आवेदन आखिरी दिन का इंतज़ार किए बिना भरने लगा।

पढ़ाई की तैयारी पहले शुरू करने लगा।

कुछ महीनों बाद उसे एक और नौकरी के इंटरव्यू का मौका मिला।

इस बार आवेदन की अंतिम तारीख से तीन दिन पहले ही उसने फॉर्म भर दिया।

अमित ने हँसते हुए पूछा—

“क्या हुआ? अब कल वाली बीमारी नहीं रही?”

राहुल मुस्कुराया।

“नहीं।”

“क्यों?”

राहुल ने अपनी पुरानी डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

उसमें वही एक वाक्य लिखा था—

“एक मौका मैंने कल के भरोसे खो दिया था। अब मैं अपना आज किसी कल के भरोसे नहीं छोड़ूँगा।”

उस इंटरव्यू में राहुल सफल हुआ।

लेकिन उसके लिए असली सफलता नौकरी पाना नहीं थी।

असली सफलता यह समझना था कि जिंदगी में हर अवसर दोबारा नहीं मिलता।

कभी-कभी हम सोचते हैं—

“अभी नहीं, कल कर लेंगे।”

लेकिन जिंदगी हमेशा हमें वह कल दे, यह जरूरी नहीं।

ज़िंदगी की सीख

आज का छोटा-सा काम कल की बड़ी परेशानी बन सकता है। और कभी-कभी हमारी “कल” की आदत हमारे जीवन का सबसे बड़ा अवसर छीन लेती है। इसलिए जो जरूरी है, उसे टालिए मत—क्योंकि सही समय अक्सर आज ही होता है।

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