मामा जी अफ़सर क्यों नहीं बने?

श्रेणी : रिश्तों का अहसास

शब्द : 774  l  पढ़ने का समय : 6 मिनट

रिश्तों का अहसास

रोज़ी ने मासूमियत से पूछा, “मम्मी, मामा जी इतनी छोटी नौकरी क्यों करते हैं? वे पापा की तरह अफ़सर क्यों नहीं बने?”

रिया एकदम चुप हो गई। उसकी आँखें भर आईं। यह सवाल उसे कई साल पीछे ले गया। 

शाम का समय था। रिया रसोई में खाना बना रही थी। तभी बाहर से उसके दोनों बच्चों की आवाज़ आई।

“दीदी, यह सवाल समझ नहीं आ रहा। एक बार समझा दो।”

यह मोनू था। वह पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था।

रोज़ी, जो आठवीं कक्षा में थी, अपनी कॉपी में कुछ लिख रही थी। उसने बिना ऊपर देखे कहा,

“मेरे पास समय नहीं है। खुद करो। मुझे हर बार तुम्हें क्यों बताना पड़ता है?”

मोनू चुप हो गया।

वह अपनी किताब लेकर एक कोने में बैठ गया।

रिया ने यह सब सुन लिया।

वह बाहर आई और रोज़ी के पास बैठ गई।

“बेटा, अगर तुम्हें सवाल आता है, तो अपने भाई को समझा दो। पाँच मिनट लगेंगे, लेकिन उसे बहुत मदद मिल जाएगी।”

रोज़ी ने कहा,

“मम्मी, उसे खुद सीखना चाहिए।”

रिया मुस्कुराई, लेकिन उसकी आँखों में अचानक एक पुरानी याद उतर आई।

वह कुछ पल तक वह चुप रही।

फिर कहा,

“आज मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी की एक बात बताती हूँ।”

दोनों बच्चे उसकी ओर देखने लगे।

रिया ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया।

“जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, मेरा एक छोटा भाई था। उसका नाम राहुल था।”

“वह पढ़ाई में ठीक था, लेकिन उसे कई बातें समझ नहीं आती थीं। वह अक्सर मेरे पास आता और कहता, ‘दीदी, यह सवाल समझा दो।'”

रिया कुछ देर के लिए रुक गई।

उसकी आवाज़ भारी हो गई।

“लेकिन मैंने कभी उसकी मदद नहीं की।”

रोज़ी और मोनू चुपचाप सुन रहे थे।

रिया ने आगे कहा,

“मैं हमेशा उसे टाल देती थी। कभी कहती कि  समय नहीं है। कभी उसकी किताब छिपा देती। कभी उसे खेलने के लिए बुला लेती ताकि वह पढ़ ही न सके।”

मोनू हैरान होकर बोला,

“मम्मी, आपने ऐसा क्यों किया?”

रिया ने गहरी साँस ली।

“क्योंकि मुझे लगता था कि मम्मी-पापा राहुल से ज़्यादा प्यार करते हैं। जब भी वे उसके लिए कोई नई किताब लाते, मुझे जलन होती थी। जब भी उसकी तारीफ़ होती, मुझे गुस्सा आता था।”

“मैं बच्ची थी। मुझे समझ नहीं थी कि मैं क्या कर रही हूँ।”

“मैं बस यही चाहती थी कि वह पढ़ाई में आगे न बढ़े।”

घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

रिया की आँखें भर आईं।

“धीरे-धीरे राहुल का पढ़ाई से मन हट गया।”

“वह पीछे रहने लगा।”

“एक दिन उसने स्कूल ही छोड़ दिया।”

रोज़ी ने धीमी आवाज़ में पूछा,

“फिर?”

रिया ने खिड़की से बाहर देखा।

“आज वह एक छोटी-सी नौकरी करता है। सुबह से रात तक मेहनत करता है, फिर भी घर का खर्च मुश्किल से चलता है।”

“जब भी मैं उससे मिलती हूँ, वह हँसकर बातें करता है। उसने कभी मुझे दोष नहीं दिया।”

“लेकिन मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाई।”

मोनू ने धीरे से पूछा,

“क्या सिर्फ़ आपकी वजह से?”

रिया ने सिर झुका लिया।

“नहीं बेटा, ज़िंदगी में एक गलती से सब कुछ नहीं होता। कई वजहें होती हैं। लेकिन उसकी राह मुश्किल बनाने वालों में मैं भी थी।”

“अगर मैं उसकी मदद करती… अगर मैं उसे पढ़ने के लिए आगे बढ़ाती… शायद उसकी ज़िंदगी कुछ और होती।”

रिया की आँखों से आँसू निकल आए।

“मुझे बहुत देर से एहसास हुआ कि भाई-बहन एक-दूसरे के दुश्मन नहीं होते।”

“वे एक-दूसरे की ताकत होते हैं।”

रोज़ी अब तक चुप थी।

वह उठी।

मोनू के पास गई।

उसकी किताब खोली और मुस्कुराकर बोली,

“चलो, आज से हम साथ में पढ़ाई करेंगे। मुझे जो कुछ भी पता है, मैं तुम्हें समझा दूँगी।”

मोनू के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

वह खुशी से अपनी कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गया।

रिया दोनों को देखती रही।

उसके मन का बोझ थोड़ा हल्का हो गया।

वह जानती थी कि वह अपने भाई का बीता हुआ समय वापस नहीं ला सकती।

लेकिन वह अपनी बेटी को वही गलती दोहराने से ज़रूर रोक सकती थी।

उस रात उसने अपने भाई राहुल को फ़ोन किया।

सामान्य बातें हुईं।

हँसी-मज़ाक भी हुआ।

लेकिन फ़ोन रखने के बाद रिया बहुत देर तक चुप बैठी रही।

उसे लगा, कुछ रिश्तों में माफ़ी शब्दों से नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी को सही रास्ता दिखाने से मिलती है।

उस दिन उसे अपनी सबसे बड़ी गलती का अहसास हुआ।

उसने अपने भाई का भविष्य नहीं छीना था, लेकिन उसके भविष्य को कठिन बनाने में उसका भी एक हिस्सा था।

और यही एहसास उसे जीवन भर याद रहने वाला था।

उसने मन ही मन एक वादा किया—

अगर कोई बड़ा भाई या बहन अपने छोटे भाई-बहन का हाथ थाम ले, तो शायद किसी दूसरे घर का ‘राहुल’ स्कूल नहीं छोड़ेगा।

नीना कुछ देर चुप रही। फिर उसने सुनील की ओर देखते हुए कहा, “मैं तुमसे ऑफिस में हुई बात छिपाना नहीं चाहती, लेकिन