तीस दिन, एक नई ज़िंदगी

श्रेणी : दिल को छू लेने वाली कहानियाँ

शब्द : 1109  l  पढ़ने का समय : 5 मिनट

तीस दिन, एक नई ज़िंदगी

अकेलापन, फिर एक नई शुरुआत। और फिर, कभी न भूलने वाली रंजना।

साठ साल का मोहन कई महीनों से अकेला रह रहा था।

उसका घर बड़ा था, लेकिन घर में आवाज़ें नहीं थीं।

सुबह उठता तो सामने खाली कुर्सी दिखाई देती। शाम को ऑफिस से लौटने की आदत अब भी थी, जबकि वह कई साल पहले नौकरी से रिटायर हो चुका था।

उसकी पत्नी का कुछ साल पहले निधन हो गया था और बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में दूर जा चुके थे।

फोन पर कभी-कभी बात हो जाती थी।

लेकिन फोन की आवाज़ और किसी का सामने बैठकर बात करना एक जैसा नहीं होता।

धीरे-धीरे मोहन को अपना घर भी छोटा लगने लगा था।

एक दिन उसने अलमारी से पुराने कपड़े निकाले, एक बैग पैक किया और तय कर लिया कि वह कुछ दिनों के लिए कहीं दूर जाएगा।

उसे नहीं पता था कि कहाँ जाना है।

बस इतना पता था कि वह अपने घर से दूर जाना चाहता था।

स्टेशन पहुँचकर उसने पहली ट्रेन का टिकट ले लिया।

ट्रेन चल पड़ी।

मोहन खिड़की के पास बैठकर बाहर देखने लगा।

कुछ देर बाद उसके सामने वाली सीट पर एक युवा लड़की आकर बैठ गई।

उसके हाथ में लैपटॉप और एक छोटी-सी डायरी थी।

बैठते ही उसने मुस्कुराकर पूछा,

“आप कहीं घूमने जा रहे हैं?”

मोहन ने उसकी ओर देखा।

“हाँ… शायद।”

लड़की हँस पड़ी।

“शायद?”

“हाँ। मुझे खुद नहीं पता कि कहाँ जा रहा हूँ।”

लड़की को यह जवाब मज़ेदार लगा।

“तो आप बहुत दिलचस्प इंसान हैं।”

मोहन भी हल्का-सा मुस्कुरा दिया।

लड़की का नाम रंजना था।

वह एक ब्लॉगर थी और लोगों की ज़िंदगी, उनके अनुभवों और उनकी समस्याओं पर लिखती थी।

वह बहुत बातूनी थी।

कुछ ही मिनटों में उसने मोहन से उसकी नौकरी, परिवार, यात्रा और पसंद के बारे में कई सवाल पूछ लिए।

मोहन काफी समय बाद किसी अनजान व्यक्ति से इतनी देर तक बात कर रहा था।

उसे अच्छा लग रहा था।

कुछ देर बाद रंजना ने पूछा,

“क्या आप अकेले रहते हैं?”

मोहन ने खिड़की की ओर देखते हुए कहा,

“हाँ।”

“आपको अकेलापन महसूस होता है?”

इस बार मोहन ने कोई मज़ाक नहीं किया।

“बहुत।”

रंजना कुछ पल चुप रही।

फिर उसने अपनी डायरी बंद कर दी।

“क्या आप मेरी एक मदद करेंगे?”

मोहन ने हैरानी से पूछा,

“मैं?”

“हाँ। मैं बुज़ुर्ग लोगों के अकेलेपन पर एक प्रोजेक्ट कर रही हूँ। मैं सिर्फ़ उनके बारे में लिखना नहीं चाहती। मैं यह समझना चाहती हूँ कि अकेलापन महसूस करने वाला इंसान अपने जीवन को फिर से कैसे बदल सकता है।”

मोहन ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।

“तो मुझे क्या करना होगा?”

रंजना मुस्कुराई।

“मेरे साथ तीस दिन बिताने होंगे।”

मोहन की आँखें फैल गईं।

“तीस दिन?”

“हाँ। एक शांत रिज़ॉर्ट है। वहाँ मैं आपके लिए हर दिन एक छोटा-सा कार्यक्रम बनाऊँगी। आपको उसे पूरा करना होगा। फिर आप मुझे बताएँगे कि आपको कैसा महसूस हुआ। मैं उसे अपने ब्लॉग पर लिखूँगी।”

मोहन ने पूछा,

“और अगर मैं बीच में हार गया?”

रंजना हँस पड़ी।

“तो हम अगले दिन फिर कोशिश करेंगे।”

मोहन ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया।

“ठीक है। मैं तैयार हूँ।”

पहला दिन बहुत आसान था।

रंजना ने उसे सुबह सूर्योदय देखने के लिए कहा।

मोहन कई सालों बाद इतनी सुबह बाहर निकला था।

सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे से निकला।

मोहन काफी देर तक उसे देखता रहा।

रंजना ने पूछा,

“कैसा लगा?”

मोहन ने कहा,

“सुंदर था। लेकिन मैं भूल गया था कि सुबह इतनी खूबसूरत भी होती है।”

दूसरे दिन उसे रिज़ॉर्ट के बगीचे में किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत करनी थी।

तीसरे दिन उसे अकेले बैठकर अपने जीवन की पाँच अच्छी यादें लिखनी थीं।

चौथे दिन उसे किसी की मदद करनी थी।

पाँचवें दिन रंजना ने उसे पुराने गाने सुनने के लिए कहा।

हर दिन कुछ नया था।

धीरे-धीरे मोहन बदलने लगा।

वह सुबह खुद उठकर बाहर जाने लगा।

लोगों से बातें करने लगा।

एक दिन उसने रिज़ॉर्ट में काम करने वाले एक कर्मचारी के साथ बैठकर चाय पी।

दूसरे दिन उसने एक बुज़ुर्ग दंपति के साथ खाना खाया।

कई दिनों बाद उसने अपने बेटे को खुद फोन किया।

बात सिर्फ़ पाँच मिनट की हुई।

लेकिन फोन रखने के बाद उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

रंजना ने पूछा,

“क्या हुआ?”

मोहन ने कहा,

“कुछ नहीं। बस बेटे से बात की।”

रंजना मुस्कुराई।

“कभी-कभी ‘कुछ नहीं’ ही बहुत कुछ होता है।”

दिन बीतते गए।

अब मोहन को रंजना के कार्यक्रम का इंतज़ार रहने लगा था।

लेकिन सिर्फ़ कार्यक्रम का नहीं।

उसे रंजना से बात करने का भी इंतज़ार रहता था।

रंजना भी अब मोहन को सिर्फ़ अपने प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं समझती थी।

वह उसे एक ऐसे इंसान की तरह देखने लगी थी, जिसने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ खोया था, लेकिन फिर से जीना सीख रहा था।

तीसवाँ दिन आ गया।

रंजना ने मोहन से कहा,

“आज कोई कार्यक्रम नहीं है।”

मोहन ने हैरानी से पूछा,

“क्यों?”

“क्योंकि अब आपको किसी कार्यक्रम की ज़रूरत नहीं है।”

मोहन चुप रहा।

फिर उसने कहा,

“जब मैं यहाँ आया था, तब मुझे लगा था कि मैं अकेलेपन से भाग रहा हूँ।”

“लेकिन अब समझ आया कि मैं अपनी ज़िंदगी से ही दूर भाग रहा था।”

रंजना की आँखें नम हो गईं।

मोहन ने आगे कहा,

“तुमने मुझे कोई जादू नहीं दिखाया। बस मुझे लोगों के बीच वापस ले आई।”

रंजना मुस्कुराई।

“और आपने मुझे सिखाया कि अकेलेपन की कहानी लिखना आसान है, लेकिन उसे महसूस करना बहुत अलग बात है।”

दोनों कुछ देर चुप रहे।

तीस दिनों में उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया था, जिसकी दोनों ने कभी उम्मीद नहीं की थी।

वह रिश्ता न किसी नाम का मोहताज था, न किसी वादे का।

बस एक गहरा अपनापन था।

मोहन ने घर लौटने से पहले अपना बैग उठाया।

इस बार उसके कदम भारी नहीं थे।

वह जानता था कि घर में फिर वही चार दीवारें होंगी।

लेकिन अब उसे उन दीवारों से डर नहीं लगता था।

उसने तय किया था कि वह हर हफ्ते किसी दोस्त से मिलेगा, लोगों से बात करेगा, बाहर जाएगा और अपनी ज़िंदगी को फिर से जीएगा।

स्टेशन पर ट्रेन आने वाली थी।

रंजना ने पूछा,

“अब अगली यात्रा कब करेंगे?”

मोहन मुस्कुराया।

“शायद जल्दी। लेकिन इस बार भागने के लिए नहीं…”

“जीने के लिए।”

रंजना मुस्कुरा दी।

मोहन ट्रेन में बैठ गया।

ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।

खिड़की से रंजना दिखाई देती रही।

मोहन ने हाथ हिलाया।

उसके चेहरे पर कई साल बाद वह मुस्कान थी, जो सिर्फ़ खुशी की नहीं थी।

वह जीवन में वापस लौटने का अहसास था।

मिट्टी की कीमत-बदलाव का अहसास
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